16 March, 2011

‘‘अवसर के उदगार ’’......... ‘यह समाज’--रचना की आंख ।


 ! और कंहा होता है सहज, सहजता को अपना लेना ! कवि तो माध्यम भर । कृति के केन्द्रीय सहज स्वर की कवि ‘सहज’ की उक्त कड़ी ने कड़ी जोड़ दी है भाव श्रंखला की । ‘अवसर के उदगार’ काव्य कृति 2003 ई. की 112 प्रष्ठों के कलेवर में, धर्म प्रसंग/ भावाभिव्यक्ति/ अवसर विशेष/ आध्यात्मिक उर्जा/छात्र जीवन की रचनाओं का परिवेश संवारती सम्मुख है ।

      यह काव्य धर्म चेतना/ जागरूक मतदाता भूमिका/ संतुलन की जीवनधुरी तलाशता है । आशा की डोर, खंड-2 की ‘आशा और जीवन’- 108 मुक्तक माला का हाथ थामता है । आंतकवाद की जडों को टोहता है । साधुसंतो को अबेरता है । तप अभिनन्दन सारता है । खुद को पहिचानने की ललक जगाता है । मित्र में महावीरत्व संचारित करता है । मन की भाषा भणता है । कैसे बने जीवन सफल ! राह बताता है ।                                           

      कविता करिकै ‘तुलसी’ न लखै/कविता ही लखै तुलसी की कला ।  इस तुलसी वाणी तक वादग्रस्त कथित प्रगतिशील समीक्षक पहुंचते थक जाएगा पर कृतिकार कवि ‘सोहन’ नहीं । मैने काव्य कृति की मुख्य रचनाधारी सीध पाठकों को दिखा दी । अब वे पढें-गुणे और मन में भणे- सबकुछ परोसा पाठकों को मिलेगा तो वह आज के हेतुवादी समीक्षकों की तरह पढा लिखा अपढ़ रहजाएगा । 

      इस कृति की प्रतिनिधी कविता है - ‘यह समाज’ । जिस समाज में हम रहते हैं - कविता उसी की, कवि उसी का । पूरी कृति की आत्मा का उदधोष इसमें है - धर्म-कर्म-धन और आत्म घोषित भगवन्तों की खबर लेता कवि बोलता है ‘‘यह समाज कितना बेढंगा/बेपरवाह/बेकार हो रहा आज ।.......करते सब अपनी मनमानी/जिसने जैसी मनमें ठानी/धर्मार्थ का धन खाकर/ लोग यहां कहलाते दानी/धूर्त यहां धनवान बने/पापी देखो पुण्यवान बने/ बेईमान निर्दयी अन्यायी/अब धरती के भगवान बने/ढोंगी भी पढ़ रहे नमाज/ ---‘यह समाज’ ।

       यह रचना - कृति की कुंजी है । यह सहज केन्द्रिय स्वर है । ..... ‘साफ कहना - सहज रहना’ । इस सहज स्वर धारा में प्रवाहित है खंड-2 की 108 छंदी मुक्तक माला । ब्याहीजी जयचन्द्लाल जी गोलछा ‘सहन’ को ‘सहज’ कवि का यह काव्यार्पण है --- ‘यह समाज’ झांकता है इसमें ।
                          
                                    ..........ओंकार श्री, उदयपुर । 

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